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प्लाज़्मा अनुसंधान संस्थान, प्लाज़्मा विज्ञान के विभिन्न पक्षों, जिसमें मौलिक प्लाज़्मा भौतिकी, चुम्बकीय परिसीमित तापीय प्लाज़्मा तथा औद्योगिक प्रयोग के लिए प्लाज़्मा तकनीकियाँ शामिल है, का अनुसंधान करने वाला भारत में एक प्रमुख अनुसंधान संस्थान है। इसके अतिरिक्त संस्थान में अभी स्थिर अवस्था सुपरकंडक्टिंग टोकामक (SST-1) के निर्माण की प्रक्रिया प्रगति पर है। साथ ही यह संस्‍थान अंतर्राष्‍ट्रीय इटर परियोजना में भागीदार भी है।

हमारे बारे में
स्‍थान
प्लाज़्मा अनुसंधान संस्थान साबरमती नदी के तट पर इंदिरा पुल के समीप भाट गाँव (जिला- गाँधीनगर) में स्थित है। यह अहमदाबाद तथा गाँधीनगर के बीच में है। अहमदाबाद से यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है, क्योंकि यह अहमदाबाद हवाई अड्डे से लगभग 5 किलोमीटर तथा अहमदाबाद रेलवे स्टेशन से 14 किलोमीटर की दूरी पर है। संस्थान तक आने के लिए प्राइवेट टैक्सी तथा ऑटोरिक्शा किराये पर आसानी से मिल जाता है। संस्थान के समीप मदर डेयरी तथा कनोरिया अस्पताल दो अन्य प्रसिद्ध संस्‍थान हैं।
प्लाज़्मा अनुसंधान संस्थान की जड़े 1970 के दशक के प्रारम्भ में भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) में अंतरीक्षीय प्लाज़्मा की घटनाओं को समझने के लिए प्लाज़्मा भौतिकी पर सैद्धान्तिक तथा प्रायोगिक अध्ययन हेतु प्रारम्भ किये गए संगत एवं अंतःक्रियात्मक कार्यक्रम से जुड़ी है। प्रारम्भिक अध्ययन में E x B अस्थिरता, अक्षीय इलेक्ट्रोजेट की विशेषता, पुच्छलतारीय प्लाज़्मा सौर पवन अंतःक्रिया के संदर्भ में प्लाज़्मा निष्क्रिय गैस अंतःक्रिया एवं ऐडियाबेटिक चुम्बकीय दर्पण में एकल कण परिरोधन को शामिल किया गया। अरैखिक आयन ध्वनिक तरंगों एवं द्विस्तरीयता को बाद में इसके अंतर्गत जोड़ा गया। 1978 में प्रारम्भ किये गए टोराइडल उपकरणों में सुदॄढ टोराइड एवं इलेक्ट्रॉन रिंग बनाने हेतु तीक्ष्ण इलेक्ट्रॉन पुँजों का प्रयोग उच्च शक्ति प्लाज़्मा प्रयोगों ने संलयन - उपयोगी प्रयोगों को पुन:आरम्भ किया।

सन् 1982 में भारत सरकार के चुम्बकीय परिसीमित उच्च तापीय प्लाज़्मा पर अध्ययन हेतु प्रस्ताव को स्वीकार किया गया एवं इसके परिणाम स्वरूप विज्ञान तथा तकनीकी विभाग द्वारा समर्थित प्लाज़्मा भौतिकी कार्यक्रम (PPP) की स्थापना हुई। भारत का प्रथम टोकामक आदित्य का अभिकल्पन एवं अभियांत्रिकी इसी समय प्रारम्भ किया गया। 1984 में इन गतिविधियों को अहमदाबाद शहर की सीमा से लगे भाट गाँव स्थित एक स्वतंत्र प्रांगण में ले जाया गया। इसके साथ ही PPP 1986 में विज्ञान तथा तकनीकी विभाग के अंतर्गत प्लाज़्मा अनुसंधान संस्थान एक स्वायत्‍तशासी संस्था के रूप में परिणित हुआ। 1989 में आदित्य के संस्‍थापन के साथ ही पूर्णतः टोकामक प्रयोग प्रारम्भ किये गए। कगारीय विक्षोभ के कारण परिवहन पर केन्द्रित एक गतिशील प्रायोगिक कार्यक्रम इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण खोज है। इस अवधि में प्लाज़्मा प्रक्रमण एवं मौलिक तथा संगणनात्मक प्लाज़्मा अनुसंधान में नये कार्यक्रमों का विकास भी हुआ।

1000 सेकण्ड तक प्रचालन में सक्षम द्वितीय चरण के सुपरकन्डक्टिंग स्थिर अवस्था टोकामक SST-1 के निर्माण हेतु 1995 में लिये गए निर्णय के साथ ही संस्थान तेजी से विकास करने लगा तथा परमाणु ऊर्जा विभाग की प्रशासनिक छत्रछाया के अंतर्गत आ गया। स्पंदित शक्ति, उन्नत नैदानिकी, संगणन मॉडलिंग, रेडियो आवृत्ति (आरएफ)  तथा निष्क्रिय पुँज तापन प्रणाली आदि का विकास जैसे नये बड़े कार्यक्रम इसमें शामिल किये गए। औद्योगिक प्लाज़्मा गतिविधियों को औद्योगिक प्लाज़्मा प्रौद्योगिकी सुविधा केन्द्र के अंतर्गत पुनर्गठित किया गया तथा 1998 में गांधीनगर में एक अलग प्रांगण में स्थानांतरित किया गया।

प्लाज़्मा भौतिकी तथा संबंधित तकनीकों में मौलिक तथा अनुप्रयुक्त अनुसंधान के क्षेत्र में अपने योगदान के कारण प्लाज़्मा अनुसंधान संस्थान अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना जाता है। इसके पास 200 वैज्ञानिक तथा अभियंता हैं जो कि सैद्धान्तिक प्लाज़्मा भौतिकी, संगणनात्मक आरेखण, सुपरकन्डक्टिंग चुम्बक तथा क्रायोजेनिकी, अति-उच्च निर्वात, स्पंदित शक्ति, सूक्ष्मतरंग एवं आरएफ, संगणक आधारित नियंत्रण एवं आंकड़ा प्रापण तथा औद्योगिक, पर्यावरणीय एवं नियोजित प्लाज़्मा उपकरणों में विशेष रूप से दक्ष हैं।